Aak KE BEST 9+ UPYOG

Aak KE BEST 9+ UPYOG JO AAPKO JANNA CHAIYE

अन्य भाषाओं में आक नाम

संस्कृत – बालार्क , मंदार , अर्क , वसुक पंजाबी – अक
हिन्दी – अकवन , सफेद Aak , मदार
तेलगु – तैलाजिलिलड्डे
गुजराती – धोलो आकड़ो
अरबी – माडर , उपर
मराठी – पांढरी रूई , आकमदार
अंग्रेज़ी – केलोट्रापिस जाइसेंटिया
बंगाली – आकन्द
लैटिन – केलोट्रापिस प्रोसेरा

परिचय

Aak का पौधा शुष्क और ऊसर भूमि में उगाया जाता है । आक के पौधे के विषय में यह कहा जाता है कि यह विषैला होता है । यदि इसका सेवन अधिक मात्रा में किया जाए तो मनुष्य को उल्टी – दस्त हो जाते हैं और कभी – कभी इसकी अधिकता से मृत्यु भी हो जाती है । इसके विपरीत यदि इसका सेवन उचित मात्रा में किया जाए तो अनेक रोगों का निवारण होता है ।

प्रयोग

Aak का प्रयोग मोतियाबिंद , दंत निष्कासन , आधा सीसी , मिर्गी आदि रोगों में किया जाता है ।

विभिन्न रोग व उपचार

आधासीसी

जंगली कंडों ( उपलों ) की राख को Aak के दूध में तर करके छाया में सुखा लेना चाहिए । इसमें से 125 मिलीग्राम सुंघाने से छींकें आकर सिर का दर्द , आधासीसी का दर्द , जुकाम , बेहोशी इत्यादि रोगों में लाभ होता है ।

Aak की छाया शुष्क की हुई मूलत्वक के 10 ग्राम चूर्ण में सात इलायची तथा कपूर और पिपरमेंट 500 मिलीग्राम मिलाकर और खूब खरल कर शीशी में भरकर रख लें , इसमें सूंघने से छींकें आकर व कफ स्राव होकर आधासीसी आदि सिरदर्द में लाभ होता है । मस्तक का भारीपन दूर होता है ।

पीले पड़े हुए Aak के 1-2 पत्तों के रस की नस्य लेने से आधासीसी के दर्द में लाभ होता है , किंतु लगती बहुत है , अत : सावधानी से प्रयोग करें ।

रक्तातिसार

अर्क की मूल को छाया में सुखाकर व पीसकर चूर्ण कर लें फिर इसे कपड़छन कर लें । 65 मिली लीटर ठंडे जल के साथ इस चूर्ण को 50 से 125 मिलीग्राम की मात्रा में दें , रक्ततिसार में लाभ होगा ।

दंत पीड़ा

रूई की फुरैरी बनाकर Aak के दूध में भिगोकर , घी में मलकर दाढ़ में लगाने से दाढ़ की पीड़ा मिटती है ।
अंगुली जितनी मोटी जड़ को आग में शकरकंदी की तरह भूनकर उसका दातुन करने से दंत रोग व दंत पीड़ा में तुरंत लाभ पहुँचता है ।

Aak के दूध में नमक मिलाकर दाँत पर लगाने से दंत पीड़ा मिटती है ।
हिलते हुए दाँत पर आक का दूध लगाकर उसे सरलता से निकला जा सकता है ।
आक के 8-10 पत्तों को 10 ग्राम काली मिर्च के साथ पीसकर उसमें थोड़ी हल्दी व सेंधानमक मिलाकर मंजन करने से दाँत मज़बूत रहते हैं ।

बवासीर

3 बूंद Aak के दूध को राई पर डालकर और उस पर थोड़ा कुटा हुआ जवाखार बुरककर बताशे में रखकर निगलने से बवासीर बहुत जल्दी नष्ट हो जाती है ।
हल्दी चूर्ण को आक के दूध में सात बार भिगोकर सुखा लें , फिर अर्क दुग्ध द्वारा ही उसकी लम्बी – लम्बी गोलियाँ बनाकर छाया में सुखाकर रख लें । प्रातः – सायं शौच कर्म के बाद थूक में या जल में घिसकर मस्सों पर लेप करने से कुछ ही दिनों में मस्से सूखकर गिर जाते हैं ।

शौच जाने के बाद Aak के 2-4 ताजे पत्ते तोड़कर गुदा पर इस प्रकार रगड़ें कि मस्सों पर दूध न लगे केवल सफेदी ही लगे । इससे मस्सों में लाभ होता है ।

बांझपन

सफेद Aak की जड़ को महीन पीसकर 1 से 2 ग्राम की मात्रा में 250 मिली लीटर गाय के दूध के साथ सेवन कराएँ । शीतल पदार्थों का पथ्य दें । इससे बंद ट्यूबें व नाड़ियाँ खुलती हैं तथा मासिकधर्म व गर्भाशय की गाँठों में भी लाभ होता है और बाँझपन दूर होता है ।

दाद

Aak के दूध में समभाग शहद मिलाकर लगाने से दाद शीघ्र नष्ट हो जाता है ।
आक की जड़ 2 ग्राम चूर्ण को 2 चम्मच दही में पीसकर लगाते रहने से भी दाद में लाभ होता है ।

कुष्ठ

Aak के 10-20 फलों को बिना अग्नि में तपाए हुए मिट्टी के बर्तन में भरकर , मुँह बंद कर उपलों की आग में फूंक दें । ठंडा होने पर अंदर से भस्म को निकालकर सरसों के तेल में मिलाकर लगाएँ । गलित कुष्ठ की प्रथम अवस्था में लाभ होता है ।

आक के छाया शुष्क पुष्पों का महीन चूर्ण बनाकर आधा ग्राम सुबह – शाम ताज़े जल से सेवन करने से कुष्ठ में लाभ होता है । कोमल प्रकृति वालों को इसकी मात्रा कम लेनी चाहिए ।

Aak की मूल त्वक का चूर्ण 250 मिलीग्राम , शुंठी चूर्ण 250 मिलीग्राम , शहद के साथ नित्य तीन बार सेवन कराएँ । साथ ही इसकी छाल को सिरके में पीसकर पतला पतला लेप करते रहें । यह प्रयोग लम्बे समय तक करें । इससे कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है ।

ज्वर

आक के पीले पत्तों को कोयलों की आग पर जलाकर भस्म करें , यह भस्म 500 मिलीग्राम शहद के साथ चटाएँ । ज्वर में लाभ होता है ।
Aak की नई कोपल डेढ़ नग , आक के पुष्प की बंद कली 1 नग दोनों को गुड़ में लपेट गोली बनाकर , ज्वर वेग के 2 घंटे पूर्व सेवन कराने से ज्वर वेग रुक जाता है ।

ज़रव्म

इसके 4-5 पत्तों को सुखाकर उनको कूट – छानकर सड़े हुए जख्मों पर बुरकने से दूषित माँस दूर होकर स्वस्थ माँस पैदा होता है और घाव भर जाता है ।

मिर्गी

Aak के ताजे फूल और काली मिर्च को इकट्ठा महीन पीसकर 300-300 मिलीग्राम की गोलियाँ बनाकर रखें और दिन में 3-4 बार सेवन कराएँ । मिर्गी में लाभ होता है ।

सफेद Aak के फूल 1 भाग और पुराना गुड़ तीन भाग , पहले फूलों को पीसकर , फिर गुड़ के साथ खूब खरल करें । चने जैसी गोलियाँ बना लें । प्रातः व सायं 1-2 गोली ताज़े पानी के साथ सेवन करें । कुछ दिनों सेवन करने से किसी के दौरे समाप्त हो जाते हैं ।

अर्क के दूध में थोड़ी शक्कर या मिश्री खरल कर रखें । मात्रा 125 मिलीग्राम । प्रतिदिन प्रातः सौ मिली लीटर गर्म दूध के साथ सेवन करें ।

कान का दर्द

Aak के भली प्रकार पीले पड़े पत्तों को थोड़ा – सा घी चुपड़कर आग पर रख दें , जब वे झुलसने लगें , चटपट निकालकर निचोड़ लें । इस रस को थोड़ी गर्म अवस्था में ही कान में डालने से कान का दर्द तुरंत ठीक हो जाता है ।

आक के पीले पके बिना छेद वाले पत्तों पर घी लगाकर अग्नि में तपाकर उसका रस कान में दो – दो बूंद डालने से लाभ होता है ।

श्वास एवं रवाँसी

Aak के पत्तों पर जो सफेद क्षार – सा छाया रहता है , उसे 5 ग्राम से 10 ग्राम तक गुड़ में लपेटकर गोली बनाकर खाने से कफ छूटकर कास और श्वास में लाभ होता है ।

Aak के दूध में चनों को डुबोकर मिट्टी के बर्तन में बंद कर उपलों की आग में भस्म कर लें । 125 मिलीग्राम की मात्रा में शहद के साथ दिन में 3 बार चटाने से असाध्य खाँसी में भी तुरंत लाभ होता है ।

पुराने से पुराने आक की जड़ को छाया शुष्क करके निर्वात स्थान में जलाकर राख कर लें । इसमें से कोयले अलग कर दें । 1 से 2 ग्राम तक इस राख को शहद या पान में रखकर खाने से कास और श्वास में लाभ होता है ।

नेत्र रोग

अर्क मूल की छाल को जलाकर कोयला कर लें और इसे थोड़े पानी में घिसकर नेत्रों के चारों ओर तथा पलकों पर धीरे – धीरे मलते हुए लेप करें तो आँखों की लाली तथा खुजली व पलकों की सूजन आदि मिटती है।

मोतियाबिंद

Aak के दूध में पुरानी ईंट का महीन चूर्ण 10 ग्राम तर कर सुखा लें , फिर उसमें लौंग 6 नग मिला , खरल कर लें इसमें से चावल भर पिसा पाउडर नासिका द्वारा प्रतिदिन प्रातः नस्य लेने से मोतियाबिंद में शीघ्र लाभ होता है । यह प्रयोग सर्दी -जुकाम में भी लाभ पहुंचाता है ।

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